अपने लिखे का प्रकाशन भी प्राणों की भीतरी अकुलाहट है। यह जीवन है, कोई मैन्यूफेक्चरिंग यूनिट का प्रोडक्ट नहीं। यह नहीं कि मशीन में कच्चा माल डाला और प्रोडक्ट बाजार की यात्रा करने लगा । पुस्तक को भी यश चाहिए और अर्थ का बाजार भी। और यश यदि फेसबुकिया- इंस्टाग्रामिया हो जाए, अखबारी सुर्खियों में आ जाए, तो क्या कहने !
जब जन्म के सोलह संस्कार होते हैं, तो पुस्तक के क्यों नहीं? आखिर वह भी तो लेखक की साँसों का जीवित रूप है। दोनों की प्रसव पीड़ा के अपने रूपान्तर है। मनुस्मृति की तरह प्रकाशन- स्मृति भी जरूरी है। या भरत के नाट्यशास्त्र की तरह प्रकाशन शास्त्र। इन दिनों प्रकाशन के सेन्सेक्स के हिसाब से पुस्तक प्रकाशन के सोलह संस्कारों का विधि- विधान सरेआम होना चाहिए । समय के साथ संस्कारों में अंतर भी आए, पर लेखक के गर्भगृह से प्रकाशन-गृह और सोशल मीडिया तक झलकियां तो दिखनी ही चाहिए । लाइक्स- कमेन्ट्स और बधाइयों के बगैर पुस्तक का जन्म बेमानी है। लाइक्स का उतापा ही मीडिया प्रवाह में मल्टीविटामिनस हो जाता है। पुस्तक प्रकाशन के सोलह संस्कारों का प्रारूप विचारार्थ प्रस्तुत है-
1-रचनाधान संस्कार - उनींदे से भीतर कुछ फ्लैश होता है। कोई सृजन बिंब । दो नदियों का संगम । ग्लेशियर का टूटना । हरी घास पर क्षणभर का विचार । कसमसाते जीवन का कथासूत्र । कुछ मितली- सी भीतर में उगने का आभास । अस्पताल की तरह कुछ पॉजीटिव संकेत ।
2- भाव- गर्भ संस्कार -
लगता है कि दिशाओं' में पंछी उड़ रहे हैं। तिनका- तिनका घोंसला बना रहे हैं । कुछ नये - स्वाद, पुराने से उबकाई । विचाधाराएँ कुलबुलाने लगती हैं। दर्शन के मसाले आ टपकते हैं। शब्द हूक मचाते हैं, नयी इबारत के लिए । उठते-बैठते शिराओं में इनझनाहट मची रहती है ।
3-शब्द -प्राशन संस्कार -
भाव लिपि शब्दलिपि के लिए बेचैन रहती है । जन्म से पहले ही किताब नामकरण के लिए फड़फड़ाती है । बच्चे और किताब में यही अंतर है । बच्चे के पैदा होने के बाद जलवा पूजन में नामकरण संस्कार होता है । किताब फेसबुकिया जलवा पूजन में पहले नामकरण मांगती है। एक नया- सा नाम ताकि प्रकाशक खिंचे चले आएं । मीडिया आकाश में नगाड़े बजें । लाइक्स- वाइक्स धुआँधार हो जाएं ।
4- शब्द गिनावन संस्कार-
शब्दों का स्केल्टन जब कथानक रचने लगे तो लगता है ,अब यह पक्का आकार लेगी । तब फेसबुक पर कुछ लिख देते हैं-उपन्यास के दस हजार शब्द पूरे हुए। सत्तर हजार । एक लाख | कंप्यूटर बाबा का बेरोमीटर मुस्कान बढ़ा देता है ।
5-अंश- छपावन संस्कार-
उपन्यास की पूर्णता पर झलक दिखाऊ और प्रकाशन अगाऊ संस्कार भी बाजार की बानगी है। जैसे अंकुए से गेहूँ निकालकर या देशी घी को उल्टी हथेली पर सूंघकर उसकी क्वालिटी परखी जाती है । वैसे ही किसी पत्रिका में अंश छपावन संस्कार बिक्री और प्रकाशन का गेट खोल देता है ।
6- प्रकाशन सगाई संस्कार -
समृद्ध और नामी-गिरामी परिवार के बच्चों को शादी सगाई तो पुराने जमाने में परात में बिठाकर हो जाती थी । वैसे ही नामी रचनाकारों को अग्रिम रॉयल्टी की परात मे बिठाकर खूँटाबद्ध कर लिया जाता है । अनामी के लिए नमूना अंश की बानगी सगाई संस्कार के लिए कंकू- कन्या बन जाती है । अपने ही जेबी रक्तचंदन से किताबी स्नान आज का यथार्थ है ।
7 -कवर पेज दिखावन संस्कार
प्रसव संस्कारों से अलग चेहरा दिखाऊ कवर पेज संस्कार लुभावक होता है। दो तीन कवर पेज फेसबुक पोस्ट कर पाठकों की लोकतांत्रिक पसन्द से कोई कवर पेज का चयन
के. बी. सी.के ओपीनियन पोल की तर्ज पर पाठकीय लोकतंत्र बन जाता है ।
8- पुस्तक का गृह- प्रवेश संस्कार
पुस्तक का गृहप्रवेश फेसबुक फोटो का तत्काल- चिपक संस्कार बन जाता है । यह पुस्तक प्रकाशन का चित्रात्मक राजपत्र हैं । पुस्तक खरीदी का ऑनलाइन गेटवे।परस्पर सहकारी । कुछ लचकीले- दबकीले मित्र नम्बर घुमा ही देते हैं । वरना बधाई- बधाई और शुभकामनाओं का खाली लिफाफा टिका देते हैं ।
9- विमोचन-लोकार्पण संस्कार
सभाकक्ष की दीवारों के बीच लोकव्यापी संस्कार होता है । तीन सौ किताबों के प्रकाशन का संपूर्ण लोक के लिए समर्पण ।दो प्रशंसाधर्मी समीक्षक । कोई चहेता मगर नामी अध्यक्ष । पेट-पूर्ति, फोटो- फूर्ति और अखबार- सूरती से मीडिया आकाश में कवरेज से झंडा गाड़ देता है ।
10- पुस्तक प्रेषण संस्कार
कुंकुम- पत्रिका की तरह नामवर
लेखकों से कुछ प्रशंसाधर्मी शब्दों के आशीर्वाद के लिए पुस्तकें रजिस्टर्ड यात्रा करने लगती हैं । नामवर पंक्ति में अपना प्लेटफार्म बनाने के लिए यह जरूरी संस्कार है ।यह दरख्वास्त भी कि पुस्तक पढ़ते समय कवर पेज का फोटो पठनीय मुद्राओं के साथ फेसबुक पर गुलाब की- सी सुन्दरता और मुस्कान के साथ पोस्ट हो जाए ।
11- समीक्षा लिखावन संस्कार
समीक्षा के भी अपने-अपने हर्बल ब्यूटी पार्लर हैं। समीक्षकों से सहकारिता मित्रता के सोपान रच जाती है।पर पीले चावल की मनुहार के बिना पक्का मित्र- समीक्षक भी बाराती नहीं बन पाता। खासकर जब मशीनें किताबें उगल रही हैं और समीक्षकों के फसल हार्वेस्टर बहुत कम हैं।
12- समीक्षा पोस्टिंग संस्कार
समीक्षा की तलब जितनी लेखक को होती है, उससे कमतर समीक्षक को । आंखें टोह में रहती हैं।मचलती हैं । पत्रिकाओं में छ्पा दिखते ही फेसबुक पर समीक्षा-वेध कर दर्शकों में लाइक्स का गणित रचाती हैं ।
13- फेसबुकिया चर्चा संस्कार
लेखक को भी कुछ दरवाजे खींचते हैं । नामी साहित्यकारों की अध्यक्षता और समीक्षकों के साथ सोशल मीडिया पर चर्चा के दौर फेसबुक और ज़ूम के कंठहार बन जाते हैं । प्रकाशक भी इनमें अपना प्रोमो पा जाता है । शब्दों के पंख फड़फड़ाते हुए शिखराना कार्नर तालाशते हैं । सभी लोग धरती से कुछ उठा हुआ महसूस करते हैं ।
14- सम्मान करावन संस्कार
इन दिनों यह संस्कार चोटी की तरह मूर्धन्य है। मित्र लोग ही स्थानीय सम्मान रचा लेते हैं, स्थानीय सुर्खियों के लिए ।सम्मान योजना में प्रवेश शुल्क देकर पुरस्कार की छोटी -बड़ी राशि से चयन आधारित सम्मान अखिल विस्तार दे जाता है । आवागमन खर्च सध जाता है, और ब्याज में समारोही आनंद ।यों कुछ लोग सम्मानों से असहमत होते हुए भी सम्मान पा ही लेते हैं।
15-समीक्षा संकलन प्रकाशन संस्कार
अपने रक्त- चंदन से मिले शब्द-चंदन का समीक्षा-संग्रह यश का काल- पात्र है।अर्थ भी यश का पिछलग्गू बन गया है । पुरानों की तरह जेब पर ताला लगाकर नहीं रखता । समीक्षा संग्रह की बेचैनी उसे अगले पायदान पर खड़ा करेगी । फिर से फेसबुकिया से लेकर पोस्टिंग प्रक्रिया तक ले जाएगी।
16- शोध- करावन संस्कार
इन दिनों लेखन भी शोध-प्रक्रिया से गुलाबी हो जाता है। ढाई सौ टंकित पन्नों का शोध ग्रंथ विश्वविद्यालय से स्वीकृत होते ही फेसबुक पेज पर ठप्पे का मानद अलंकार बन जाता है । इसके बाद तो जैसे प्रोडक्ट को आई. एस. ओ. मार्का मिल जाता है, वैसे ही लेखक को भी।
पुस्तकें सरस्वती का अभिदान हैं । लेखक का यशस्तिलक ।पारदर्शी अलमीरा की मूर्ति ।गूगल बाबा के घर सर्च पड़ताल । कोश और वेबसाइटों की अक्षर-वाल ।काल पात्र में शब्द ब्रह्म का यह प्रकाशन वासी भी हैं और प्रवासी भी । अपने युगप्रवाह से कौन बचा है? क्या व्यंग्यकार भी बच पाया है?
लेखक : बी. एल .आच्छा
